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क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है

क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है
जब केंद्रीय बैंकों के पास कॉर्पोरेट फाइनैंशियल परिसंपत्तियां होती हैं तो जाहिर है हालात बिल्कुल अलग होते हैं। लेकिन तब यह सवाल पैदा होता है कि केंद्रीय बैंक कॉर्पोरेट परिसंपत्तियां रखते ही क्यों हैं? यह उन प्रोत्साहन पैकेज की विरासत है जो कई पश्चिमी केंद्रीय बैंकों ने क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है संकट के समय अपने वित्तीय क्षेत्र को दिए। ऐसे अन्यायपूर्ण क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है निवेश में कार्बन-न्यूट्रल का आकलन मामले को और जटिल बना देता है।

उधार करके घी पियो!!

सभी संप्रभु देशों की सरकारें, देश के विकास के लिए धन जुटाने के लिए, कर या शुल्क लगाती हैं। इनके अलावा, वे ऋण के माध्यम से भी संसाधन जुटाती हैं। आपको जान कर हैरानी होगी कि यह ऋण इतना अधिक होता है कि वर्तमान में विश्व के सभी देशों की सरकारों का कुल ऋण विश्व की कुल सालाना आय का 77 प्रतिशत है। भारत सरकार का ऋण उसकी आय का 67 प्रतिशत है। कुछ देश ऐसे है जिनके लिए यह अनुपात 100 से अधिक है। यानि उनके ऋण का बोझ क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है उनकी सालाना आय से भी अधिक है।

संप्रभु बॉन्ड क्या है?

सरकारें इस ऋण को बॉन्ड के माध्यम से लेती हैं। सोवरेन या संप्रभु बॉन्ड एक तरह का अनुबंध है जिसमें बॉन्ड खरीदने वालों को सरकार एक निश्चित ब्याज देने का वायदा करती है। संप्रभु बॉन्ड के खरीदार को सरकार से समय-समय पर ब्याज भुगतान प्राप्त होता है, और बॉन्ड की समयावधि पूरी होने के बाद या परिपक्व होने पर, बॉन्ड में लगाई गई राशि का भुगतान सरकार करती है।

कॉरपोरेट बॉन्ड के प्राइवेट प्लेसमेंट को क्यों पसंद करती हैं कंपनियां, होनी चाहिए जांच: RBI डिप्टी गवर्नर

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिप्टी गवर्नर टी रबी शंकर (T Rabi Sankar) ने बुधवार 24 अगस्त को कहा कि इस बात की जांच करने की जरूरत है कि आखिर कंपनियां कॉरपोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds) के पब्लिक इश्यू की जगह प्राइवेट प्लेसमेंट क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है को क्यों पसंद करती हैं। बता दें कि बॉन्ड की ओपन मार्केट में बिक्री करने की जगह उसे पहले से चुने निवेशकों और संस्थानों को बेचना, प्राइवेट प्लेसमेंट कहलाता है।

टी रबी शंकर ने बॉम्बे चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री में दिए गए एक बयान में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा, "प्राइवेट प्लेसमेंट को लेकर काफी ज्यादा तरजीह दी जा रही है।" उन्होंने कहा, "शायद इस बात को देखने का समय आ गया है कि आखिर क्यों बॉन्ड जारी करने वाले संस्था पब्लिक इश्यू की प्रक्रिया को अपनाने से परहेज कर रहे हैं।"

सॉवरेन हरित बॉन्ड से 16,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है केन्द्र सरकार

मुंबई। केंद्र सरकार जल्द ही सॉवरेन हरित बॉन्ड जारी कर सकती है। वित्त मंत्रालय ने वैश्विक मानक के हिसाब से इसकी रूपरेखा को अंतिम रूप दे दिया है। सूत्रों ने बुधवार को बताया, चालू वित्त वर्ष 2022-23 की दूसरी छमाही यानी अक्तूबर से मार्च के बीच ग्रीन बॉन्ड जारी करके 16,000 करोड़ रुपये जुटाया जा सकता है। यह दूसरी छमाही के लिए उधारी कार्यक्रम का एक हिस्सा है। इसकी घोषणा इस साल के बजट में की गई थी।

सूत्रों के मुताबिक, रूपरेखा तैयार है और इसे जल्द ही मंजूरी दी जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल बजट भाषण में घोषणा की थी कि सरकार हरित इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए संसाधन जुटाने की खातिर सॉवरेन हरित बॉन्ड जारी करेगी। इस रकम को सार्वजनिक क्षेत्र की उन परियोजनाओं में लगाया जाएगा, जो अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को कम करने में मदद करती हैं।

एचडीएफसी मसाला बॉन्ड के जरिए जुटाएगा 500 करोड़, जानिए क्या होते हैं मसाला बॉन्ड्स

नई दिल्ली: क्यों सरकार विदेशी बॉन्ड जारी करती है मार्टगेज लेंडर (संपत्ति के बदले कर्ज देने वाला) एचडीएफसी ने गुरुवार को बताया कि वह विदेशी निवेशकों से रुपया नामित बॉन्ड (रुपी डॉमिनेटेड बॉन्ड) के जरिए 500 करोड़ रुपए जुटाएगा। बॉन्ड्स के बारे में तो आप सभी ने जरूर सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मसाला बॉन्ड्स क्या होते हैं? जागरण डॉट कॉम आज अपनी खबर में मसाला बॉन्ड्स के बारे में ही पूरी जानकारी देने जा रहा है।

क्या होता है बॉन्ड

बॉन्ड एक तरह का सुरक्षित ऋण होता है। जब आप बॉन्ड खरीदते हो, तब दरअसल आप सरकार, नगर महापालिका, कोरपोरेशन और फेडरल एजेंसी जैसी किसी इकाई को जारीकर्ता के तौर पर पैसे दे रहे होते हैं, यानी कि उधार। इसमें जारीकर्ता आपको एक बॉन्ड जारी करता है जिसमें यह वादा करना होता है कि आप इसकी मैच्योरिटी पूरी होने पर ब्याज समेत इसकी फेस वैल्यु का भुगतान भी करेंगे।

आखिर कितना हरित है मेरा केंद्रीय बैंक?

यह दिलचस्प बात है क्योंकि केंद्रीय बैंक अक्सर अपना अधिकांश निवेश पोर्टफोलियो स्वर्ण, राष्ट्रीय और विदेशी नकदी तथा सॉवरिन बॉन्ड के रूप में रखते हैं। ऐसे में कोई व्यक्ति यह आकलन कैसे करेगा कि बॉन्ड और नकद परिसंपत्तियां कार्बन-न्यूट्रल हैं या नहीं? अजीब बात यह भी है कि सोने को कार्बन-न्यूट्रल आकलन से बाहर रखा गया है क्योंकि इसका आकलन करने का कोई तरीका मौजूद नहीं था। मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि सोने की खदान में होने वाला काम कार्बन-न्यूट्रल है, लेकिन फिलहाल इसे जाने दें।

इस विषय पर जो भी सामग्री उपलब्ध है वह सरकारी वित्त के बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी करती है। सरकार का राजस्व सीधे व्यय से संबद्ध नहीं है। सरकार अपना कर राजस्व बढ़ाने के लिए व्यय नहीं करती। यह बात डेट के जरिये भरपाई किए जाने वाले सरकारी व्यय पर भी लागू होती है। यदि ऐसे डेट फाइनैंसिंग वाले व्यय का इस्तेमाल केवल पूंजीगत व्यय के लिए किया जाए तो भी पूंजीगत व्यय के पोर्टफोलियो का आकलन उसके कार्बन प्रभाव के आधार पर नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऐसे निवेश का बड़ा हिस्सा वित्तीय निवेश होता है। ऐसा भी नहीं है कि वे राजस्व केवल इसलिए जुटाते हैं ताकि आम परिवारों की तरह वस्तुएं एवं सेवाएं जुटा सकें। इसके अलावा सरकारी व्यय का बड़ा हिस्सा स्थानांतरण में होता है जो अर्थव्यवस्था में संसाधनों का आवंटन एवं वितरण को प्रभावित करना चाहती है। इनकी भरपाई डेट या करों के माध्यम से होती है लेकिन यहां व्यय का प्रयोग उस संदर्भ में नहीं होता है जिस संदर्भ में कंपनियां और आम परिवार करते हैं।

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